माँ के बारे में
मेरे सुख दुःख की रखति हो खबर,
मेरे सर पर साया तुम्हारा है,
मेरी नैया के खेवनहार तुम्ही,
मेरा बेड़ा पार तुम्हई से है,
सब कुछ माँ तुम्हई से है ॥
समयरेखा
खुंखर माता मंदिर (राजस्थान) के इतिहास की यात्रा
१०वीं–११वीं शताब्दी
ग़ज़नवी साम्राज्य ने उत्तर-पश्चिम भारत (पंजाब और सिंध) पर आक्रमण किया। महमूद ग़ज़नी ने राजस्थान पर भी आक्रमण किया, लेकिन कभी स्थायी नियंत्रण स्थापित नहीं कर सका।
११वीं–१२वीं शताब्दी
पृथ्वीराज तृतीय, इस वंश के सबसे प्रसिद्ध शासक।
नागौर/डीडवाना/तोषीणा का भूभाग चौहान राजपूतों, अर्थात् शाकंभरी/अजमेर के चाहमान वंशजों द्वारा शासित था।
सेठ तोसा शाह की एआई द्वारा निर्मित छवि — जिसे उस काल के 1000 से अधिक चित्रों से प्रशिक्षित किया गया है। इसमें ऐतिहासिक तस्वीरों, उस युग में ज्ञात चेहरे की विशेषताओं, उस क्षेत्र की जानकारी तथा उस अवधि के उपग्रह चित्रों का भी उपयोग किया गया है।
संवत ११३९
१२वीं शताब्दी (लगभग १०८२–११३९ ईस्वी)
- व्यापारी सेठ तोसा शाह (तोशनीवाल माहेश्वरी समाज के पूर्वज) उस समय ‘थल’ कहलाने वाले गाँव में आकर बसे।
- उन्होंने खुंखर माता का मंदिर बनवाया और उन्हें अपने कुलदेवी के रूप में स्थापित किया।
- कालांतर में गाँव को सेठ तोसा शाह की स्मृति में ‘तोषीणा’ कहा जाने लगा।
१२वीं–१३वीं शताब्दी
ग़ोरी आक्रमण (1192 ईस्वी – तराइन का युद्ध) ने दिल्ली में चौहान वर्चस्व का अंत कर दिया, लेकिन राजस्थान के राजपूतों ने अपने गढ़ मज़बूती से बनाए रखे।
१३वीं–१८वीं शताब्दी
(मध्यकालीन काल)
- मूल खुंखर माता मंदिर कालांतर में खंडहर हो गया और विलुप्तप्राय हो गया।
- विनाश का स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलता — संभवतः यह आक्रमणों अथवा प्राकृतिक ह्रास का परिणाम था।
- माता की आराधना केवल मौखिक परंपराओं और माहेश्वरी समाज के पारिवारिक अभिलेखों में ही संरक्षित रही।
तैमूर के आक्रमण (१३९८ ईस्वी)
१४वीं–१६वीं शताब्दी
१६वीं–१८वीं शताब्दी
यह क्षेत्र मुग़ल साम्राज्य में सम्मिलित हुआ, जिसके बाद इस पर मारवाड़ (जोधपुर राठौड़) का अधिकार विवादित रहा।
१९८१–१९९२
(आधुनिक पुनःखोज)
- १९८१: श्रीमती प्रभा देवी टोटला को नवरात्रि के दौरान एक देवी के आवर्ती स्वप्न आने लगे।
- १९८८: वे तोषीणा पहुँचीं और अपने दिव्य स्वप्नों में देखे हुए स्थल को माँ की कृपा से पहचान लिया।
- १९९२–१९९६: उत्खनन में प्राचीन मंदिर के अवशेष (स्तंभ, मूर्तियाँ, हवन कुंड और पत्थर की धरोहरें) प्राप्त हुए।
- जागरण के समय प्रकट हुए काले नाग को माँ का संकेत माना गया, जिसने मंदिर के पुनर्निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया।
- २५ जनवरी १९९८ को अखंड श्रद्धा और भक्ति के साथ खुंखर माताजी की दिव्य प्रतिमा, जो चार हाथों में चार तलवारें धारण कर कमल पर विराजमान हैं, का प्राण-प्रतिष्ठा एवं अलंकरण किया गया।
- २५ जनवरी १९९८: खुंखर माता की नई प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा हुई और मंदिर का पुनः जागरण सम्पन्न हुआ।
- २००३ में मंदिर का विस्तार हुआ — धर्मशाला, रसोई और भक्तों हेतु भोजनशाला का निर्माण माँ की कृपा से सम्पन्न हुआ।
- २५ जनवरी का वार्षिक स्थापना दिवस और नवरात्रि मेले प्रमुख उत्सवों के रूप में स्थापित किए गए।
- मंदिर वर्तमान में तोषीणा का प्रमुख तीर्थस्थल एवं सांस्कृतिक केंद्र है।
माँ का स्वरूप
नाम का महत्व
- खुंखर = उग्र, भयानक
- यह दिव्य मूर्ति माँ के द्वि-स्वरूप का प्रतीक है — करुणामयी मातृ-मुखाकृति और साथ ही संहार के लिए उठी चार तलवारें
- यह संदेश देती है कि माँ अपने भक्तों के लिए स्नेहमयी और दयालु हैं, किंतु अधर्म और अन्याय के विरुद्ध खूँखार और अजेय
चार भुजाएँ (चतुर्भुजा)
- माँ की चार भुजाएँ दर्शाती हैं कि वे चारों दिशाओं, चारों वेदों तथा सृष्टि, पालन, संहार और मोक्ष — इन चारों जीवन-पहलुओं की अधिष्ठात्री हैं।
- माँ के चारों हाथों में धारण किए गए खड्ग उनकी खुंखर उग्रता, अपार शक्ति और भक्तों की रक्षा हेतु सदैव सजगता का प्रतीक हैं — साथ ही वे हर दिशा से अधर्म व असुरी शक्तियों का संहार करती हैं।
खड्ग (तलवारें)
- माँ का खड्ग दिव्य शक्ति, अटूट साहस और अधर्म व नकारात्मक शक्तियों के विनाश का प्रतीक है।
- माँ के हाथों में धारण की गई चारों तलवारें उनकी अजेय शक्ति और सर्वदिशाओं में प्रवाहित दिव्य ऊर्जा का प्रतीक हैं।
कमलासन
- कमल यह दर्शाता है कि संसार के संघर्षों और क्लेशों के बीच भी निर्मलता और पवित्रता बनी रहती है।
- माँ का कमलासन इस बात का प्रतीक है कि खुंखर माता जगत की किसी भी अशुद्धि से अप्रभावित रहकर दिव्य सत्य में दृढ़ता से स्थित हैं।
- कमल समृद्धि और आध्यात्मिक जागरण का भी प्रतीक है — जिस प्रकार कीचड़ में कमल खिलता है, उसी प्रकार माँ की कृपा से भक्त अपने जीवन में खिल उठते हैं।
लेख
मार्गदर्शन और प्रेरणा देने वाले शब्दों से, विश्वास की गहराइयों में प्रवेश करें।

अपना चमत्कार / अनुभव साझा करें
माँ की अनुकम्पा हर जीवन में अलग स्वरूप में प्रकट होती है। अपने अनुभव हमें बताएँ, और हम उसे भक्तों के संग बाँटेंगे।

पूजा विधि एवं अनुष्ठान
हर उच्चारित मंत्र, हर समर्पित अर्पण और हर किया गया अनुष्ठान माँ से मिलन की ओर एक डग है। जानिए, खुंखर माता मंदिर की दिव्य पूजन परंपराएँ।

लेख
भक्ति और ज्ञान की स्वरधारा — माँ से जुड़े चिंतन, कथाएँ और शिक्षाएँ।